नववर्ष के संकल्प के पूर्वाभ्यास की बेला

आज से छः दिन बाद नव वर्ष 2024 की शुरुआत होगी । हर साल की तरह इस साल भी हम कुछ न कुछ संकल्प लेंगे । अधिकतर नववर्ष के संकल्प (new year resolution) पहले दिन या पहले हफ़्ते में ही दम तोड़ देते हैं । यदि संकल्प आवेश में आकर बिना सोचे समझे लिया जाएगा तो उसका टूटना निश्चित है । यदि आप चाहते हैं कि आपका संकल्प पूरा हो तो आप अपने संकल्प का चुनाव ठीक से करे । कोई भारी भरकम संकल्प लेने से बचे । हल्का फ़ुल्का संकल्प करें फिर उस पर दृढ़ रहे । यदि जीवन में सुधार की तरफ़ बढ़ना है तो नव वर्ष संकल्प बहुत उपयोगी है । हम हर साल छोटे छोटे संकल्प लेकर काफ़ी सुधार कर सकते हैं । अभी छः दिन का समय शेष है इस दौरान हम नववर्ष संकल्प का पूर्वाभ्यास कर सकते है। उदाहरण के लिए जैसे हमने संकल्प लिया नये साल में हम किसी के भी बारे में कोई नकारात्मक टिप्पणी नहीं करेंगे तो इसकी पूर्वाभ्यास हम अभी कर सकते हैं।
आपका नव वर्ष संकल्प अवश्य पूरा हो और आप प्रगति पथ पर अग्रसित रहें यही ईश्वर से कामना है 🙏

शुभस्य शीघ्रम

मेरे छोटे मामाजी (गोपाल मामाजी) अक्सर कहा करते थे जिसकी सुबह पिछड़ गई समझो उसका दिन भी पिछड़ गया । अगर एक बार कोई भी काम पूरे मनोयोग से शुरू कर दिया जाए तो वह काम धीरे धीरे पूरा हो ही जाता है । अगर हम काम की शुरुआत करने में देरी करेंगे तो निश्चित ही काम में पिछड़ जाएँगे । परिस्थिति कभी अनुकूल नहीं होती उन्हें अनुकूल बनाना पड़ता है । एक कहावत है अनुकूल परिस्थितियों का इंतज़ार करने वाला हमेशा इंतज़ार ही करता रहता है। सुबह शरीर और मस्तिष्क एकदम तरोताज़ा रहता है इसलिए सुबह का समय किसी भी काम के लिए सबसे उत्तम बताया गया है।

चदरिया झीनी रे झीनी

इंटर कॉलेज में हमारे पढ़ाई के दिनों में मेरे सहपाठी देवेंद्र थापा के बड़े भाई राजेंद्र थापा सांस्कृतिक कार्यक्रमों में कबीरदास जी का भजन गाते थे – चदरिया झीनी रे झीनी । स्वयं ही हारमोनियम बजाते थापा जी ग़ज़ब समाँ बाँध देते थे । इस भजन का एक एक शब्द अनमोल है । कबीर ने शरीर को चादर कहा है । बनाने वाले ने बड़े जतन और बड़े होश से इस शरीर को बनाया है । मूरख लोग इस चादर को मैली कर देते हैं ( अष्ट कमल का चरखा बनाया पाँच तत्व की पूनी , नौ दस मास बुनन को लागे मूरख मैली किन्ही ) लेकिन संत कबीर जैसे जागृत पुरुष इसे बिल्कुल मैली नहीं करते ( दास कबीर ने एसी ओढ़ी ज्यों की त्यों धर दीनी) । कबीर दास जी ने इस भजन में बताया है जीवन एक अभिनय है चाहे मंच कितना बड़ा हो इससे अधिक कुछ नहीं । इससे अधिक माना तो भटके ।

ओजस्वी किशोर दा

किशोर दा पेशे से वास्तुकार हैं । प्रतिभाशाली किशोर दा एक ओजस्वी वक्ता हैं जब बोलते हैं उनकी वाणी से तेज टपकता हैं । किशोर दा की वाणी में तेज का मूल कारण जीभ पर उनका अकल्पनीय संयम है एसा संयम केवल किताबी किरदारों में मिलता है । किशोर दा ने अपने जीवन में निंदा रस से सख़्त परहेज़ किया । सत्तर बसंत देख चुके किशोर दा ने पूरे जीवनकाल में किसी की निंदा में एक शब्द नहीं बोला । जिसका अपनी इंद्रियों में एसा संयम होता है उसका ओजस्वी होना स्वाभाविक है । महाभारत में गांधारी ने अपने नेत्रो में पट्टी बांधकर अद्भुत इंद्रीय संयम साधा था उनकी इस साधना ने इतनी शक्ति अर्जित कर ली थी कि उनकी एक दृष्टिपात ने दुर्योधन के शरीर को वज्र जैसा शक्तिशाली बना दिया था । निंदा रस मन को हल्का करता है निंदा रस का अपना आनंद है लेकिन निंदा रस वाणी के ओज को निस्तेज कर देता है । किशोर दा के कट्टर दुश्मन हैं हयात भाई । लोग मज़े लेने के लिए किशोर दा से जानबूझकर कर हयात का ज़िक्र करके किशोर दा को उकसाते हैं कि किशोर दा हयात के ख़िलाफ़ एक शब्द तो बोल दें लेकिन किशोर दा अलग ही मिट्टी के बने हैं उनके मुँह से कट्टर विरोधी हयात के लिए भी प्रशंसा के फूल ही झरते हैं ।

ट्रेनिंग की महत्ता

हमारे परम मित्र कैलाश दा जिन्हें हम प्यार से कैला बाबू कहते हैं एक कोरपोरेट ट्रेनर हैं । आज लम्बे अंतराल के बाद उनसे मुलाक़ात हुई । कैला बाबू ने ट्रेनिंग की महत्ता समझाई । बक़ौल कैला बाबू आज के प्रतिस्पर्धी माहौल में वही कम्पनी कामयाब रहेगी जो अपने कर्मचारियों की ट्रेनिंग की पर्याप्त व्यवस्था करेगी । जो लीडिंग ऑर्गनायज़ेशन हैं उन्होंने कर्मचारियों की ट्रेनिंग अनिवार्य कर रखी है कई एसे संस्थान हैं जहाँ कर्मचारी को साल में कम से कम दो सौ घंटे ट्रेनिंग लेना अनिवार्य हैं । प्रशिक्षित कर्मचारी किसी भी ऑर्गनायज़ेशन को लीडिंग बनाए रखने के लिए सबसे बड़ी सम्पत्ति हैं ।

रायचंद्र की सदा ही जय

हमने रोज़मर्रा के जीवन में दो तरह के लोग देखे होंगे रायचंद्र और कर्मचंद्र । रायचंद्र हर मुद्दे पर अपनी राय देते हैं और स्वयं ज़िम्मेदारी लेने से कोसों दूर रहते हैं । कर्मचंद्र काम करने में सबसे आगे रहते हैं लेकिन रायचंद्र बाज़ी मार ले जाते हैं और कर्मचंद्र के करम फूटे ही रहते हैं । रायचंद्र वहाँ भी अपनी राय बेबाक़ी से देते हैं जहाँ उन्हें शून्य से भी कम जानकारी होती हैं इसे कहते हैं चाय तो बोले साथ में छन्नी भी मुँह खोले। रायचंद्र केवल राय ही नहीं देते अपनी छाती खुद ही ठोकते हैं । रायचंद्र माहिर शब्दवीर होते हैं हवाई क़िले बनाने में माहिर रायचंद्र हमेशा फ़ायदे में रहते हैं ।

नर दा का न्यू ईयर रिजोलूसन

नारायण सिंह को लोग नर दा के नाम से पुकारते हैं । नर दा एक नम्बर के बेवड़े हैं सुबह कुल्ला भी शराब से करते हैं । हर साल शराब छोड़ने का रिजोलूसन लेते हैं फिर थर्टी फ़र्स्ट को ये सोचकर जमकर पीते हैं कि कल यानी अगले साल से शराब छोड़ देंगे । रात में इतनी ज़्यादा हो जाती है कि उतारने के लिए साल के पहले दिन ही सुबह ही दो पेग मजबूरी में लगाने पड़ते हैं और न्यू ईयर रिजोलूसन पहले ही दिन दम तोड़ देता है ।
अपने पिछले अनुभवों से सबक़ लेते हुए नर दा ने 2024 के लिए एक रिजोलूसन में तब्दीली की है । अब उन्होंने नए साल में गीता पाठ का संकल्प लिया है । नर दा 2024 में प्रतिदिन गीता के कुछ श्लोकों का पाठ करेंगे ।

केटालिक डीग़र दा

डीग़र दा बहुत ही दिलचस्प इंसान हैं । हमने केमिस्ट्री में पढ़ा है कि अगर किसी पदार्थ की उपस्थिति मात्र से केमिकल रिएक्सन की गति बढ़ जाती है तो उसे केटालिस्ट कहते हैं । डीग़र दा को लोग केटालिक डीग़र दा के नाम से जानते हैं । ये नाम उन्हें उनके एक विशेष गुण के कारण दिया गया । डीग़र दा भड़काऊ भाषण देने में सिद्धहस्त हैं । अगर कही पर दो पक्षों में कहासुनी हो रही हो और एसे में डीग़र दा वहाँ आ जाएँ तो बात निश्चित रूप से हाथापाई तक बढ़ जाएगी । लड़ाई झगड़े करवाना डीग़र दा का शग़ल रहा है । डीग़र दा बताते हैं कि लड़ाई झगड़ा करवाने में उन्हें मज़ा आता है । भाई भाई में ज़रा भी मनमुटाव हो जाए तो डीग़र दा उनके बीच एक गहरी खाई खोदने का काम करते हैं । डीग़र दा पुराने से पुराने मित्रों को आपस में भिड़ा देने की क्षमता रखते हैं ।

संतुलन – जीवन का मूलमंत्र

त्रिलोक सिंह जीवन संग्राम के सुभट योद्धा हैं । बड़ी से बड़ी समस्या का हल उनके पास होता है । त्रिलोक दा को शॉर्ट कट में तिल दा कहते हैं । तिल दा हरफ़नमौला इंसान हैं । स्कूल टाइम में तिल दा पढ़ाई में कुशाग्र बुद्धि होने के साथ साथ डान्स में , लड़ाई झगड़े दादागिरी , नेतागीरी हर चीज़ में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते थे । तिल दा का ब्रेक डान्स बहुत मशहूर था । दो पेग लगाकर तिल दा जब भाषण देते थे सभी उनको मंत्र मुग्ध होकर सुनते थे ।
कल अचानक तिल दा से मुलाक़ात हुई । पुरानी बातों का ज़िक्र छिड़ा और शुरू हुई चाय पे चर्चा । मैंने तिल दा से उनकी सम्पन्नता और उससे भी ऊपर उनकी ख़ुशहाली का राज पूछा । तिल दा ने एक शब्द में गागर में सागर भर दिया – संतुलन ।
जैसे हम खाना बनाते हैं तो नमक, मिर्च, मसाला इत्यादि संतुलित मात्रा में डालते हैं उसी प्रकार जीवन में संतुलन ज़रूरी है ।
अगर आप समाज सेवा करते हैं तो उसकी भी एक सीमा है । आपकी कमाई आपकी बीवी बच्चों का हक़ है । समाज सेवा में अपनी कमाई का दो प्रतिशत खर्च करने में कोई बुराई नहीं लेकिन उससे ऊपर की समाज सेवा अपने बच्चों से अन्याय करने जैसा है । इसी प्रकार बोलना अच्छी बात है लेकिन वाचाल होना ग़लत है । सब कुछ उचित मात्रा में होगा तो एक शानदार रेसिपी के साथ एक शानदार जीवन जिया जा सकता है ।

दारू की आर ओ आई

एक पुरानी ग़ज़ल है अंगूर की बेटी ने क्या क़हर ढाया है शुक्र है अंगूर को बेटा ना हुआ ।
कई बार पार्टियों में हल्के हल्के सुरूर में ये ग़ज़ल समाँ बाँध देती है । वैसे शराब भी दो प्रकार की होती है जिसको अंग्रेज़ी भाषा में लिकर और वाईन कहा जाता है । लिकर अन्य फलों से बनती है जबकि वाईन अंगूर से बनती है इसलिए इसे अंगूर की बेटी भी कहा जाता है लेकिन कई बार देशी शराब का पेग लगाने वाला भी इस ग़ज़ल को गुनगुना कर वाईन की फ़ीलिंग ले लेता है ।
शमशेर भाई कॉस्टिंग विभाग के मुखिया है । उन्हें हर काम की रिटर्न आन इन्वेस्टमेंट (आर ओ आई) निकालने की आदत है । अगर शाम को दारू पीते हैं तो भी आर ओ आई निकालने की सोचते हैं । सभी आम इंसानों की तरह घर में तो भीगी बिल्ली बने रहते हैं अगर पत्नी ने थोड़ी ज़ोर से बोल दिया तो जितनी चढ़ी होती है उससे भी ज़्यादा उतर जाती है । अब आर ओ आई तो निकालनी ही है तो घर से बाहर जितना हो हल्ला कर सकते हैं करते हैं । अगर शमशेर भाई ने दो पेग लगाए हैं तो उनसे बहस ना करें अन्यथा उन्होंने जो खर्च किया हैं उसका रिटर्न आप को चार बाते सुनाकर निकालने से शमशेर भाई चूकेंगे नहीं ।